मध्यप्रदेश का प्रागैतिहासिक इतिहास काल | MPPSC, UPSC, PEB

प्रागैतिहास

अत्‍यंत प्राचीन अतीत यानी बीते हुए काल को, जिसके लिए न तो कोई पुस्‍तक और न ही कोई लिखि‍त दस्‍तावेज उपलब्‍ध हैं, उसे प्राक् इतिहास कहा जाता है। इस आरंभिक प्रागैतिहासिक काल को पाषाण काल भी कहा जाता है। ताम्र पाषाण काल भी इसके अंतर्गत आता है।

प्रमुख स्‍थल:

आदमगढ़: आदमगढ़ होशंगाबाद के नर्मदा तट पर स्थित है। यह मध्‍यपाषाणकालीन है और प्रागैतिहासिक मानव की क्रीड़ास्‍थली रहा है। शैलाश्रय व गुफा शैल चित्र यहां की मुख्‍य विशेषता है। 1964 ई. में आर.बी. जोशी ने ‘आदमगढ़ शैलाश्रय’ में लगभग 25 हजार लघु उपकरण प्राप्‍त किये। मध्‍यप्रदेश में सबसे प्राचीनतम सभ्‍यता के प्रमाण भी आदमगढ़ से मिलते हैं।

भीमबेटका: विन्‍ध्‍य पर्वतमालाओं के उत्‍तरी छोर से घिरा भीमबेटका भोपाल से लगभग 40 किमी दूर दक्षिण में स्थित है। यह रायसेन जिले में स्थित है। यह लगभग 10 किमी ल्रबा एवं 4 किमी चौड़ाई में फैला हुआ है। यह विश्‍व का सबसे बड़ा गुफा समूह है। ऐसा माना जाता है कि यह स्‍थान महाभारत के चरित्र भीम से संबंधित है और इसी से इनका नाम भीमबेटका पड़ा।

bhim betka (मध्यप्रदेश)

भीमबेटका शैलाश्रय तथा उनमें उपलब्‍ध शैल चित्र की खोज का श्रेय प्रसिद्ध पुरातत्‍वविद् स्‍व. डॉ. विष्‍णुधर वाकणकर को जाता है। उन्‍होंने इस स्‍थल की खोज वर्ष 1957-58 में की थी। भीमबेटका की 500 से अधिक गुफाओं में लाखों साल पहले गुफावासियों के रोजमर्रा का जीवन दर्शाते शैल चित्र हैं। भीमबेटका में आखेट, युद्ध, पशु-पक्षी, धार्मिक और व्‍यक्‍ति चित्रों का अंकन है। अंकित चित्रों का संबंध पान्‍डवों के अज्ञातवास से जोड़ा जाता है। वर्ष 2003 में यूनेस्‍को द्वारा भीमबेटका की गुफा को विश्‍वधरोहर घोषित किया गया है।

कायथा: यह पुरातत्‍व स्‍थल उज्‍जैन जिले की तराना तहसील में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित है। इसे पहली ताम्रपाषाण बस्‍ती माना जाता है। यह स्‍थान ताम्रपाषाणकालीन सभ्‍यता के प्रमाण प्राप्‍ति का मुख्‍य स्‍थल है। यह वराह मिहिर की जन्‍मभूमि माना जाता है। कायथा (कापिस्‍थ) की खोज का श्रेय विष्‍णु श्रीधर वाकणकर को जाता है। 1965-66 में श्री वाकणकर के नेतृत्‍व में विक्रम विश्‍वविद्यालय के पुरातत्‍व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा कायथा में उत्‍खनन कार्य प्रारंभ करवाया। यहॉं लाल मृदभान्‍डों पर काले रंग के चित्र मौजूद हैं। इस काल के लोग जिन भान्‍डों का प्रयोग करते थे, उन्‍हें ‘मालवा भान्‍ड’ कहा जाता है।

एरण: एरण का मध्यप्रदेश के इतिहास में नहीं बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । जनरल कनिंघम ने सर्वप्रथम प्राचीन एरिकिण नगर की पहचान एरण से की। एरण प्रदेश के सागर जिले में बेतवा की सहायक नदी बीना से घिरा हुआ है। एक मत के अनुसार यहॉं बहुतायत मात्रा में पायी जाने वाले रईरक या ईरण नामक घास के कारण इसका नाम ऐसा पड़ा। कुछ अन्‍य विद्वानों का मत है कि एरण के सिक्‍कों पर नाग का चित्र है, अत: इस स्‍थान का नामकरण ऐराका नाग से हुआ है। एरण से ताम्र पाषाणकालीन सभ्‍यता के साथ प्रथम सती प्रथा का अभिललेख (510 ई.) प्राप्‍त हुआ है। यहॉं से प्राप्‍त मुख्‍य अभिलेख निम्‍नानुसार है:-

अभिलेखवंश
श्रीधर वर्मा का अभिलेखशक शासक
समुद्रगुप्‍त का अभिलेखगुप्‍त सम्राट
बुधगुप्‍त का अभिलेखगुप्‍त सम्राट
तोरभाण का अभिलेखहूण शासक
भानुगुप्‍त का अभिलेखगुप्‍त सम्राट (गोपराज सती स्‍तंभ अभिलेख या प्रथम सती अभिलेख)
ऐरण स्थित बाराह प्रतिमा और विष्णु मंडप

ऐरण में बाराह की विशालकाय प्रतिमा , एक विष्णु मंडप एवं नरसिंह मंडित स्थित है । प्राचीन में एरण की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। क्योंकि ऐरण एक तरफ़ से मालवा का एवं दूसरी तरफ़ से बुंदेलखंड का प्रवेश- द्वार माना जा सकता है । इसके अतिरिक्त चूँकि ऐरण पूर्वी मालवा की सीमा-रेखा पर स्थित है । इस कारण यह दशार्ण को चेदि जनपद को भी जोड़ता था। संभवतः इसी कारण सैनिक नियंत्रण की दृष्टि से भी इस स्थान को गुप्तकालीन शासकों ने अच्छा माना ।

नवदाटोली: खरगोन जिले के महेश्‍वर में नवदाटोली स्‍थान से ताम्रपाषाण कलीन सभ्‍यता के अवशेष प्राप्‍त हुए हैं । यह नर्मदा तट पर स्थित है। यह स्‍थान एच. डी. सांकलिया के निर्देशन में उत्‍खनित करवाया गया था।

आँवरा: यह स्‍थान मन्‍दसौर जिले में स्थित है। मध्‍यप्रदेश पुरातत्‍व विभाग के त्रिवेदी के द्वारा यहॉं उत्‍खनन करवाया गया है। यहॉं पाषाण से लेकर गुप्‍त काल तक के अवशेष प्राप्‍त हुए हैं।

डॉंगवाला: यह ताम्रपाषाण कालीन बस्‍ती उज्‍जैन जिले में स्थित है। यहॉं से 1800 ई.पू. के मृदभांड मिले हैं।

नागदा: यह स्‍थान उज्‍जैन के निकट चंबल नदी के किनारे बसा हुआ है। इस स्‍थान से ताम्रपाषाणयुगीन प्रमाण प्राप्‍त हुए हैं।

अन्‍य स्‍थल: खेड़ीनामा, बेसनगर, उज्‍जैन, महेश्‍वर, शाजापुर, इन्‍दौर, प. निमाड़, धार, जबलपुर, भिण्‍ड में 30 से अधिक ताम्रपाषाणिक बस्तियों के साक्ष्‍य मिले हैं।

मध्यप्रदेश के इतिहास की क्रमवार सम्पूर्ण जानकारी –

1. मध्यप्रदेश इतिहास का प्रागैतिहास काल
2. मध्यप्रदेश इतिहास का प्राचीन काल
.3. मध्यप्रदेश इतिहास का मध्य काल
4. मध्यप्रदेश इतिहास का आधुनिक काल  

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